चिंता ‘चिता’ समान है और चिंतन ‘अमृत’ सामान ।।

चिंता ‘चिता’ समान है और चिंतन ‘अमृत’ सामान ।। Chinta Chita And Chintan Amrit Saman Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आयुर्वेद में दो प्रकार के रोग बताए गए हैं । पहला, शारीरिक रोग और दूसरा, मानसिक रोग । जब शरीर का रोग होता है, तो मन पर और मन के रोग का शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है । क्योंकि शरीर और मन का बहुत ही गहरा सम्बन्ध होता है ।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्‍या, द्वेष और अहंकार आदि मनोविकार अर्थात ये मन के रोग होते हैं । इन मनोविकारों में एक विकार है-चिंता । यह मन का बड़ा विकार कहा जाता है और महारोग भी है ।।

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जब इन्सान को चिंता का रोग लग जाता है तो यह मनुष्य को धीरे-धीरे मारता हुआ आदमी को खोखला कर देता है । चिंता को चिता के समान बताया गया है, अंतर केवल इतना है, कि चिंता आदमी को बार-बार जलाती है और चिता शरीर को एक बार ।।

शारीरिक रोगों की चिकित्सा वैद्य, हकीम एवं डॉक्टर कर देते हैं, लेकिन मानसिक रोगों का इलाज करना इन लोगों द्वारा भी मुश्किल हो जाता है । मन के रोगों में जब कोई भी चिकित्सा काम नहीं करती है, तो उस समय धर्म शास्त्रों की चिकित्सा काम आती है ।।

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चिंता के इलाज के लिए शास्त्र बताते हैं, कि मनुष्य को चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए । जब भी चिंता सताती है, तब-तब मनुष्य को भगवान का चिंतन करना चाहिए । चिंता से घिरा जो भी आदमी चिंता का भार भगवान पर छोड़ निश्चित होने का अभ्यास करेगा उसको चिंता का रोग भी नहीं लगता ।।

इतना ही नहीं उसकी सारी समस्याओं के समाधान भगवद्कृपा से स्वत: ही निकलते रहते हैं । चिंता करने वाले व्यक्ति के लिए एक दरवाजा ऐसा है जो उसके लिए कभी भी बंद नहीं होता । वह है भगवान का दरवाजा ।।

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चारों तरफ से घिरे इंसान को भगवान का दरवाजा पार निकालता है । गीता में भगवान ने कहा है, कि जो भक्त अपने को भगवान के प्रति समर्पित करता हुआ अपना भार भगवान पर छोड़ देता है तो भगवान उसके भार को वहन करते हैं ।।

जो चिंता करता रहता है उसका चेहरा बुझता-मुरझाता रहता है । लेकिन जो परमात्मा का चिंतन करता है उसका चेहरा चमकता है । इसलिए गीता में भगवान ने बताया है, कि मनुष्य अभ्यास एवं वैराग्य से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।।

स्पष्ट है, कि चिंता के संबंध में भी व्यक्ति को परमात्मा पर पूरा भरोसा करके अभ्यास के द्वारा अपने स्वभाव में परिवर्तन करते हुए चिंता मुक्ति और सुखमय जीवन जीने का प्रयत्न करना चाहिए ।।

Shrimad Bhagwat Katha

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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