धर्म के ह्रास होने का कारण तथा ज्ञानी महात्माओं के लक्षण ।।

धर्म के ह्रास होने का कारण तथा ज्ञानी महात्माओं के लक्षण ।। Dharm Ke Hras Hone Ka Karan.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक कथा बताता हूँ आपलोगों को । दिन की बात है, की हनुमान जी के मंदिर में भक्तों की बहुत लंबी लाइन लगी थी । सभी भक्तजन अपने हाथ में नारियल और फूल लेकर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे । इसी बीच में एक परम ज्ञानी महात्मा पहुंचे और अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने लगे ।।

उन्होंने कहा कि इस पत्थर के अंदर भगवान नहीं है और बताया कि परमात्मा तो सभी जीवो के अंदर रहता है । सभी जीवो की सेवा करो, हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है । क्योंकि यह बात भागवत में भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति को उपदेश करते हुए कहा है कि “भस्मन्येव जुहोति स:” ।।

अर्थात ऐसा भक्त जो केवल भगवान की मूर्तियों में ही भगवान का दर्शन करता है वह तो मानो राख में हवन कर रहा है । सभी जीवो के अंदर परमात्मा है, यह बात अकाट्य है । लेकिन अगर हमें इस बात को पूरी तरह समझना है, तो इसके लिए प्रेक्टिकली कुछ न कुछ एक आधार चाहिए ।।

अब वह आधार हमारे पूर्वज ऋषियों ने मंदिरों और भगवान की मूर्तियों के रूप में हमें प्रदान किया है । जहां आसानी से हमारी श्रद्धा भगवान के साथ जुड़ जाती है । अन्य जगहों पर हमारी श्रद्धा डगमगा जाती है । इसलिए भगवान की मूर्ति में भगवान का दर्शन करना भले ही यह प्रथम कक्षा की पढ़ाई हो लेकिन मार्ग निर्गुण ब्रह्म तक पहुंचने का यही है ।।

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क्योंकि अगर एक बच्चा प्रथम कक्षा में पढ़ता है और उसको हम एमबीबीएस की पढ़ाई बताने लगे तो उसके ऊपर ऊपर निकल जाएगा । कुछ उसके समझ में नहीं आएगा, ऐसे ही एक भक्त जो कि भगवान का दर्शन भगवान की मूर्तियों में ही करता है उसको अगर हम कुत्ते में भगवान का दर्शन करवाने का प्रयत्न करेंगे तो निश्चित रुप से उसकी श्रद्धा भी खंडित होगी और कभी वह भगवान को कभी प्राप्त नहीं कर पाएगा ।।

ऐसे में उस भक्त के हृदय में भगवान के प्रति आस्था और विश्वास जगाने के जो मार्ग हैं वह यही है । पहले मंदिर से शुरुआत करें, और भगवान ने कहा है कि जिस ज्ञानी को परमात्मा मिल चुका है, उस ज्ञानी को चाहिए कि एक अज्ञानियों की भांति संसार के सभी कर्मों को अज्ञानी बन करके करें ।।

सामान्य लोगों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करें । यही एक परम ज्ञानी महात्मा के लक्षण होते हैं । मित्रों अगर ज्ञानी लोग परम ज्ञान का प्रदर्शन करने लगे और सांसारिक लोग उनकी बात सुनने लगें तो समस्त आचार-विचार और व्यावहारिक बातें लुप्त हो जायेंगी और एक दूसरों के प्रति सारी जिम्मेवारियाँ भी समाप्त हो जायेंगी ।।

इस बात के कुछ प्रमाण हमारे ही समाज के कुछ तथाकथित ज्ञानी महात्मा हो चुके हैं । जिनके कर्म हम देख चुके हैं, हम जब भी आध्यात्मिक बातों का दुरुपयोग करने लग जाते हैं तो समाज में विकृति फैलने शुरू हो जाती है । इसलिए यह जो वैदिक मार्ग है वह बड़ा ही वैकल्पिक मार्ग है, जिसका आचरण लगभग सभी के लिए अनुकरणीय है ।।

हमारे पूर्वज आचार्यों ने जो कुछ ऐसी बातें बताई हैं जिनका अनुकरण आज के समय में थोड़ा सा मुश्किल जरूर है । क्योंकि आज जो स्थिति है, सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ही हमें कर्म करने हैं । ताकि धर्म में और समाज में कोई विकृति उत्पन्न ना हो ।।

हमने जो देखा है कुछ लोगों को कि उन्होंने ज्ञान भक्ति और वैराग्य की जो बातें हैं उनका किस प्रकार दुरुपयोग किया है । इसलिए हमें बहुत ही सोच समझकर के और जिस कर्म से समाज जुड़ा रहे ऐसे कर्म करने चाहिए । ताकि समाज में कोई विकृति ना आए और सब लोग धर्म के प्रति आस्थावान हो ।।

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आप अगर महात्मा है, तो अपने ज्ञान को अंतर ह्रदय में रखिए । इस प्रकार आपकी भक्ति भी हो जाएगी और इससे आपकी श्रद्धा में भी कोई विकृति नहीं आएगी । बल्कि हमारे समाज में भी कोई विकृति नहीं आएगी । दिखावे में आप जो कुछ भी करते हैं वह सामान्य मनुष्यों की भांति ही करते रहे ।।

क्योंकि हमारे पूर्व आचार्य जितने भी हुए सबने गृहस्थ धर्म का विधिवत पालन किया है । सभी में समानता बनी रहे इसके लिए भरपूर प्रयत्न किए हैं । हाँ सबने अपने-अपने विचार दिए हैं शास्त्रों के माध्यम से । लेकिन अपने विचार किसी के ऊपर जबरदस्ती नहीं थोपा है । इसलिए हमें भी इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ।।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥२६॥

अर्थ – कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी जनोंकी बुद्धिमें भ्रम पैदा नहीं करना चाहिए; किंतु ईश्वर में युक्त, ज्ञानी होकर शास्त्रविहित कर्म भलीभाँति करते हुए उन्हें भी वैसे ही प्रवृत्त रहना चाहिए ।।

मित्रों, हनुमान जी के मंदिर में दर्शन के लिए लगी उस भीड़ में एक परम ज्ञानी कबीर दास जी महाराज पहुंचे । उन्होंने कहा अरे मूर्खों यह पत्थर है इसके अंदर कोई भगवान नहीं है मैं जानता हूं मैंने देखा है भगवान को ।।

इसके अंदर भगवान नहीं है जाओ अपना अपना काम करो । अब जिनके अंदर श्रद्धा थी वह लोग तो डंडा लेकर दौड़ पड़े मारने के लिए । लेकिन अगर 0.1 परसेंट लोग भी अगर उनके साथ हो लिए तो कुछ तो धर्म में विकृति आयी ।।

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यह ज्ञानियों के लक्षण नहीं है, इसीलिए शायद भगवान ने गीता में यह उपरोक्त श्लोक कहा है । ज्ञानी होकर के भी अज्ञानियों की तरह समाज में सबको दिखा कर कर्म में प्रवृत्त रहें वही परम ज्ञानी कहलाने के योग्य है ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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