एक बार ही जी भर कर सज़ा क्यों नहीं दे देते ?

एक बार ही जी भर कर सज़ा क्यों नहीं दे देते ? Ek Bar Hi Jibhar Ke Saja Kyon Nahi de dete.

 

जय श्रीमन्नारायण,
      प्यारे कन्हैया, प्यारे कान्हा जी !

 

आरजू नहीं के ग़म का तूफान टल जाये ।
फ़िक्र तो ये है कि मेरा दिल न बदल जाये ।।
बुलाना हो अगर मुझको तो एक एहसान करना ।
दर्द इतना देना कि मेरी जान निकल जाये ।।

Pyare Kanhaiya

संसार की बातें –

फेर लेते हैं नज़र, दिल से भुला देते हैं ।
क्या यूँ ही लोग वाफ़ाओं का सिला देते हैं ।।

लिखूं कुछ आज प्रेमभरी मुलाकातों की बातें ।
मेरे दिल का दर्द और हालातों की बातें ।।

 

मिलने का वादा करके छोड़कर चले गयें ।
वापस लौटकर आउंगा ये कहकर चले गयें ।।
अबतक न आयें, अब मेरे मरने पर आना ।
वादा अपना निभाना ये बोलकर चले गयें ।।

Bhagwan Narayan

जैसे:-

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।१।।

अर्थ:- एक साथ रहने वाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी जीवात्मा एवं परमात्मा, एक हि वृक्ष शरीर का आश्रय लेकर रहते हैं । उन दोनों में से एक जीवात्मा तो उस वृक्ष के फल, कर्मफलों का स्वाद ले-लेकर खाता है । किंतु दूसरा, ईश्वर उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ।।

 

एक बार ही जी भर कर सज़ा क्यों नहीं दे देते ?
अगर मैं इतना ही गलत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते ?
अगर मोती हूँ, तो अपने दामन में पिरो लो मुझे ।
नहीं आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते ?
अगर तुम्हारा साया हूँ तो साथ ना रखने की वजह क्या है?
अगर पत्थर हूँ तो रास्ते से सदा के लिये हटा ही क्यूँ नहीं देते?

Swami Dhananjay Maharaj

क्योंकि प्यारे ! आपके बिना हमारा कोई आस्तित्व ही नहीं बचता ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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