मन को वश में कैसे करें । एक बेहतरीन आख्यान ।।

जय श्रीमन्नारायण,

यह पंक्तियाँ कबीरदास जी की हैं । कबीरदास जी इन पंक्तियों के माध्यम से यह कहना चाहते हैं, कि सबका कारन यह मन ही है । मन के वजह से ही कितने लोग वनवासी (तपस्वी) हो गए । और फिर मन के कारण ही कितने तपस्वी घर चले आये ।।

क्योंकि यह कहीं ठहरता ही नहीं है । यह अत्यंत लालची है । संसारी लोग न जाने क्या-क्या नहीं करते इससे मुक्ति हेतु । परन्तु जबतक इसे वशीभूत न कर लिया जाय, तबतक कोई तपस्या, योग, ध्यान, कर्म एवं उपासना आदि फलित नहीं होते ।।

मित्रों, एक आख्यान सुनाता हूँ । एक राजा था उसके पास एक बकरा था । एक बार उस राजा ने ऐलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त कर देगा मैं उसे अपना आधा राज्य दे दूंगा । किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं स्वयं करूँगा ।।

इस घोषणा को सुनकर एक पण्डित जी राजा के पास आकर कहने लगे की बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है । मैं इसका पेट भरकर दिखाऊंगा । ऐसा कहकर वह बकरे को लेकर जंगल में गये और सारे दिन उसे घास चराया । शाम तक पण्डित जी ने बकरे को खूब घास खिलाई ।।

फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है अब तो इसका पेट भर गया होगा । अब इसको राजा के पास ले चलूँ ताकि हमें इनाम मिल सके । इस प्रकार मन में विचार करके पण्डित जी उस बकरे के साथ राजा के पास चल दिये । वहां पहुंचा तो राजा ने पूछा – बकरे का पेट भर गया । पण्डित जी ने कहा आप स्वयं आप परीक्षा लेकर देख लें राजन ।।

राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा । इसपर राजा ने पण्डित जी से कहा की आपने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता । बहुतों ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्योंही दरबार में बकरे के सामने घास डाली जाती की वह खाने लगता ।।

एक महात्मा जी ने सोचा इस घोषणा के पीछे कोई गूढ़ रहस्य अवश्य ही है । मैं युक्ति से काम लूँगा! महात्मा जी बकरे को चराने के लिए लेकर गए । परन्तु वो इसका रहस्य समझ चुके थे । जैसे ही बकरा घास खाने को करता तो महात्मा जी उसे एक लकड़ी के डंडे से मार देते । दिन में ऐसा कई बार हुआ तथा सम्पूर्ण दिवस ऐसा ही चलता रहा ।।

अंत में बकरे ने सोचा की यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी । शाम को महात्मा जी बकरे को लेकर राजदरबार में लौट आये । जबकि पुरे दिन उन्होंने बकरे को बिलकुल ही घास नहीं खिलाई थी । फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है । अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा, आप परीक्षा कर सकते हैं ।।

राजा से घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या देखा और सूंघा तक नहीं । क्योंकि बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी की घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी । अत: उसने घास की ओर देखा तक नहीं ना ही खाई । वास्तव में यह बकरा हमारा मन ही है । इसे हम चाहे जितना भी विषयों को चराते रहें, यह कभी भी तृप्त नहीं होता है ।।

बकरे को घास चराने ले जाने वाला जीवात्मा अर्थात हम ही हैं । इस मन पर नियम-संयम रूपी अंकुश रखो । मन सुधरेगा तो जीवन सुधरेगा । मन को विवेकरूपी लकड़ी से प्रतिपल पीटो । कारण कि भोग से यह बकरा रूपी मन कभी तृप्त नहीं हो सकता । भोगी रोगी होता है, भोगी की भूख कभी शांत नहीं होती क्योंकि त्याग में ही तृप्ति समाई हुई है ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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