जया अथवा अजा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।।

जया अथवा अजा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Jaya Or Aja Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को जया या अजा एकादशी कहते हैं । यह एकादशी अधिकांशतः अंग्रेजी माह के अनुसार सिंतबर के महीने में आती है । इस व्रत को करने से करनेवाले की खोई हुई संपत्ति और वैभव प्राप्त हो जाती है ।।

इसके साथ ही मनुष्य समस्त विकारों एवं पापों पर विजय प्राप्त कर लेता है । मूलतः यह व्रत रात्रि जागरण का माना जाता है । अत: इस दिन भगवान विष्णु का पूजन कर उपवास पूर्वक रात्रि जागरण भी किया जाता है ।।

जया अथवा अजा एकादशी के पूजन की विधि ।। Jaya Or Aja Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi.

एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन करें । दिनभर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मन्त्र का यथासम्भव जप करें और रात्रि को पुन: भगवान नारायण का पूजन करके रात्रि जागरण करें ।।

अगले दिन ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें । ऐसा करने से व्रत पूर्ण समझा जाता है । व्रत के दौरान अन्न का सेवन, क्रोध, मदादि से दूर रहें । इस व्रत को करने से इस लोक के सम्पूर्ण सुखों की प्राप्ति होती है और परलोक में नारायण का सान्निध्य प्राप्त होता है ।।

इस व्रत के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है । व्रत को कर पाने में असमर्थ व्यक्ति को भगवान कृष्ण की अराधना करनी चाहिए और अन्य विकारों से भी बचना चाहिये तथा चावल नहीं खाना चाहिये । ऐसा करने वाले को भी व्रत करने का ही फल मिलता है ।।

व्रत को करने से कार्यों में आ रही बाधाएं दूर हो जाती हैं । जो मेहनत करने के बाद भी धन लाभ नहीं कर पाते हैं, उनकी भी दरिद्रता का नाश होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है ।।

पूरे दिन व्रत रखें संभव हो तो रात्रि में भी व्रत रखकर जागरण करें । अगर रात्रि में व्रत संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं । द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें जनेऊ सुपारी देकर विदा करें फिर भोजन करें । इस प्रकार नियम एवं निष्ठा से व्रत रखने से जीव को पिशाच योनि से भी मुक्ति मिल जाती है ।।

जया अथवा अजा एकादशी व्रत की कथा ।। Story Of Aja Or Prabodhini Ekadashi.

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु! आप मुझ अजा एकादशी के बारे में बताएं । इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अर्जुन! भाद्रपद के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं । यह एकादशी सभी पापों को नष्ट करने वाली और अत्यंत शुभ फल देने वाली है ।।

इस एकादशी को अजा अथवा प्रबोधिनी तो कहा ही जाता है परन्तु साथ ही कई जगहों पर इसे जया अथवा कामिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है । इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है ।।

जया अथवा अजा एकादशी की कथा ।। Story Of Aja Or Prabodhini Ekadashi.

इस एकादशी का व्रत करने वाले कि समस्त मनोकामनायें भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी पूर्ण करते हैं । श्री कष्ण ने अर्जुन से कहा कि इस व्रत को करने वाले लोगों को कैसे-कैसे फल मिले यह सुनों ।।

सत्ययुग में सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र हुए जो बड़े सत्यवादी थे । एक बार राजा ने स्वप्न में देखा कि उन्होंने अपना सारा राज्य ऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया है । अगले दिन ऋषि विश्वामित्र जब दरबार में आये तो राजा ने सचमुच अपना सारा राज्य उन्हें सौँप दिया ।।

उन्होंने स्वप्न में दिये अपने वचन की खातिर अपना सम्पूर्ण राज्य राजऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया । दक्षिणा देने के लिए अपनी पत्नी एवं पुत्र को ही नहीं अपितु स्वयं तक को दास के रुप में एक चण्डाल को बेच डाला ।।

परन्तु इस विपरीत परिस्थिति में भी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का रास्ता नहीं छोड़ा । उस चांडाल का सेवन करते हुए एक दिन राजा यह सोचने लगे कि इस परिस्थिति से मुझे कब छुटकारा मिलेगा ।।

वह इस प्रकार चिंतन कर ही रहे थे कि उनके सामने गौतम ऋषि आ गए । राजा ने उनसे अपनी पूरी व्यथा सुनाई । गौतम ऋषि ने राजा की पूरी बात सुनी और बहुत दुखी हुए । उन्होंने राजा को अजा एकादशी करने की सलाह दी ।।

उन्होंने राजा से कहा, हे राजन- भाद्रपद में कृष्णपक्ष की एकादशी व्रत का अनुष्ठान विधि पूर्वक करो और समस्त रात्रि जागरण करके भगवान का स्मरण करो । इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पापों का क्षय हो जायेगा और तुम सभी प्रकार के कष्टो से छूट जाओगे ।।

इस प्रकार राजा को उपदेश देकर गौतम ऋषि वहां से चले गए । गौतम ऋषि ने जिस प्रकार राजा को व्रत करने की विधि बताई थी, उसी प्रकार राजा ने व्रत का अनुष्ठान किया और सारी रात जागरण करते हुए भगवान के नाम का स्मरण करते रहे ।।

गौतम ऋषि के कहने पर राजा ने अजा एकादशी का व्रत करना आरंभ कर दिया । इस दौरान उनके पुत्र रोहताश का साँप के काटने पर देहांत हो गया और उसकी माता अपने पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान पहुंची तो राजा ने उससे भी कर माँगा ।।

लेकिन उनके पास कर के नाम पर देने को कुछ भी नहीं था । राजा हरिश्चन्द्र के बार-बार कर मांगने से रानी ने अपनी चुनरी का आधा भाग फाड़कर कर के रुप में दे दिया ।।

उसी समय आकाश में बिजली चमकी और भगवान प्रकट हुए और बोले – राजन! आपने सत्य को जीवन में धारण कर के उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है । अत: आपकी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है । इस प्रकार राजा को अपना राजपाट, पत्नी और बच्चा सब वापस मिल गया और वह सुखी-सुखी जीवन व्यतीत करने लगा ।।

भगवान ने कहा कि आप इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के नाम से अमर रहेगें । भगवान की कृपा से रोहित भी जीवित हो गया । तीनों प्राणी चिरकाल तक सुख भोगकर अन्त में स्वर्ग में चले गए ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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