निर्जला अथवा भीमसेनी एकादशी व्रत विधान एवं कथा सहित हिंदी में ।।

निर्जला अथवा भीमसेनी एकादशी व्रत विधान एवं कथा सहित हिंदी में ।। Nirjala Ekadashi Vrat Vidhi And Katha In Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सर्वाधिक महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है । बिना पानी पिये इस व्रत को किया जाता है इसलिये इसे निर्जला एकादशी व्रत कहते हैं ।।

निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है । उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है ।।

निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं । जो श्रद्धालु वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं होते उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए ।।

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क्योंकि निर्जला एकादशी व्रत का उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं । एक बार पाण्डु पुत्र भीमसेन ने श्री वेदव्यास जी से पूछा ! हे परम पूजनीय विद्वान पितामह ! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी व्रत करते हैं ।।

मेरे भ्राता आदि सभी जन मुझे भी व्रत करने के लिए कहते हैं । किन्तु मुझसे भूखा नहीं रहा जाता । आप कृपा करके मुझे बताएं कि उपवास किए बिना एकादशी व्रत का फल कैसे मिल सकता है ?।।

श्रीवेदव्यासजी बोले, पुत्र भीम ! यदि आपको स्वर्ग बड़ा प्रिय लगता है । वहां जाने की इच्छा है और नरक से डर लगता है तो हर महीने की दोनों एकादशी के व्रत को अवश्य ही करना ही पड़ेगा ।।

भीम सेन ने कहा कि यह उनसे नहीं हो पाएगा । तब श्रीवेदव्यास जी बोले, ज्येष्ठ महीने के शुल्क पक्ष की एकादशी को व्रत जिसे निर्जला एकादशी कहते हैं उसे कर लेना । परन्तु उस दिन अन्न तो क्या, पानी भी नहीं पीना चाहिये ।।

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उस एकादशी के अगले दिन प्रातः काल स्नान करके, स्वर्ण एवं जल दान करना चाहिये । इसके बाद पारण के समय (व्रत खोलने के समय) ब्राह्मणों एवं परिवार के साथ अन्नादि ग्रहण करके अपने व्रत को विश्राम देना चाहिये ।।

जो एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीए रहता है तथा पूरी विधि से निर्जला व्रत का पालन करता है । उसे वर्ष में आनेवाली सभी एकादशियों का फल सहज ही प्राप्त हो जाता है ।।

वर्ष कि सभी एकादशियों का फल इस एक एकादशी का व्रत करने से सहज ही मिल जाता है । यह सुनकर भीम सेन उस दिन से इस निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करने लगे और वे सभी पापों से मुक्त हो गए ।।

इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी । निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष में किया जाता है ।।

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अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में आता है । साधारणतः निर्जला एकादशी का व्रत गँगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है ।।

परन्तु कभी-कभी किसी वर्ष में गँगा दशहरा और निर्जला एकादशी दोनों एक ही दिन पड़ जाते हैं । एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं । एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है ।।

एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अत्यावश्यक होता है । यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के साथ ही करना चाहिये ।।

द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान माना गया है । एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए । जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए ।।

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हरि वासर का मतलब द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होता है । व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है । व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए ।।

यदि कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण कर लेना चाहिए । कभी-कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है ।।

जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन का एकादशी व्रत करना चाहिए । दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं । सन्यासियों, वैष्णवों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन का व्रत करना चाहिए ।।

जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी या वैष्णव एकादशी अगले ही दिन होती हैं । भगवान नारायण के प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को एकादशी व्रत अवश्य करना चाहिये ।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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