ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं!!

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।।

अर्थ:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्दों का अभाव और दोषरहितत्व � ये छ: ‘सूत्र’ के लक्षण कहे गये हैं ।।

शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दसामिति ।
ज्योतिषामयनं चैव षडंगो वेद उच्यते ।।

अर्थ:- शिक्षा (उच्चार शास्त्र), कल्पसूत्र, व्याकरण (शब्द/ व्युत्पत्ति शास्त्र), निरुक्त (कोश), छन्द (वृत्त) और ज्योतिष (समय/खगोल शास्त्र) � ये छ: वेदांग कहे गये हैं ।।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।।

अर्थ:- सर्ग (उत्पत्ति), प्रतिसर्ग (लय), पुनरुत्पत्ति, मन्वन्तर (अलग अलग मनु से शुरु होनेवाला काल) और वंशानुचरित (कथाएँ) ये पुराण के पाँच लक्षण हैं ।

विषययोगानन्दौ द्वावद्वैतानन्द एव च ।
विदेहानन्दो विख्यातो ब्रह्मानन्दश्च पञ्चमः ।।

अर्थ:- विषयानंद, योगानंद, अद्वैतानंद, विदेहानंद और ब्रह्मानंद, ऐसे पाँच प्रकार के आनंद हैं ।।

ग्रन्थार्थस्य परिज्ञानं तात्पर्यार्थ निरुपणम् ।
आद्यन्तमध्य व्याख्यान शक्तिः शास्त्र विदो गुणाः ।।

अर्थ:- ग्रंथ का संपूर्ण ज्ञान, तात्पर्य निरुपण करने की समझ और ग्रंथ के किसी भी भाग पर विवेचन करने की शक्ति � ये शास्त्रविद् के गुण है ।।

Sevashram Sansthan Silvassa

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