पापांकुशा एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।।

पापांकुशा एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं । इस एकादशी पर मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है । धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते हैं, वही फल इस एकादशी पर शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करने मात्र से ही मिल जाते हैं और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पड़ते हैं ।।

इस एकादशी उपासक (व्रत करने वाले) के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है । पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है । इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है । इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह वैकुण्ठ का भागी होता है । इस एकादशी के दिन दान करने से अनेक प्रकार के शुभ फलों की प्राप्ति होती है । श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम माना जाता है ।।

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पापाकुंशा एकादशी व्रत विधि ।। Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi.

मित्रों, इस व्रत का पालन दशमी तिथि के दिन से ही करना चाहिए । दशमी तिथि पर सात धान्य अर्थात गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल नहीं खानी चाहिए, क्योंकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है । जहां तक संभव हो दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना चाहिए । दशमी तिथि को भोजन में तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।।

एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए । संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का । संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है । इसके साथ भगवान विष्णु का स्मरण एवं उनकी कथा का श्रवण किया जाना चाहिये । इस व्रत को करने वाले को विष्णु के सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए । इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है, बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है ।।

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पापांकुशा एकादशी व्रत कथा ।। Papankusha Ekadashi Vrat Katha.

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान ! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है ? अब आप कृपा करके इसकी विधि तथा फल कहिए । भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर ! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है । हे राजन! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्‍मनाभ की पूजा करनी चाहिए । यह एकादशी मनुष्य को मनवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है ।।

जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नरकवासी होते हैं । सहस्रों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्‍मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं ।।

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हे राजेन्द्र! यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन की देने वाली है । एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं । हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है । हे युधिष्ठिर! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं । वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाते हैं ।।

हे नृपोत्तम! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्‍गति को प्राप्त होता है । आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं । स्वर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता ।।

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जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह साँस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है । निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धनवालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवाकर दान करना चाहिए । ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्‍य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं ।।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे राजन! जो आपने मुझसे मुझसे पूछा वह सब मैंने आपको बतलाया । अब आपकी और क्या सुनने की इच्छा है ?युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन् ! इस व्रत को सर्वप्रथम किसने किया था? तथा किसके कहने से किया था ? कृपा करके इस व्रत की कथा भी बतायें ।।

भगवान कृष्ण कहने लगे, कि राजन ! प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था । वह बड़ा क्रूर था, उसका सारा जीवन पाप कर्मों में ही बीता । जब उसका अंत समय आया तो वह मृत्यु के भय से कांपता हुआ महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर याचना करने लगा- हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं । कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो सके । उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करके को कहा । महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया जिसके फलस्वरूप उसके किए गए सारे पापों से उसने छुटकारा पा लिया ।।

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पापांकुशा एकादशी का महत्व ।। Papankusha Ekadashi Importance.

पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है।

एकादशी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है। यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है। इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है ।।

जो इस पापांकुश एकादशी का व्रत रखता है, उसे अच्छा स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य मिलता है । भगवान नारायण को मानने वालों के लिए, इस एकादशी का विशेष महत्व होता है । रीती रिवाजों के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले कृष्ण एवं राधा की पूजा अर्चना करते है । इस एकादशी के बारे में “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में भी लिखा हुआ है, और इसे पाप से मुक्ति के लिए सबसे अधिक जरुरी माना गया है । इस पुराण के अनुसार महाराज युधिष्ठिर, भगवान् कृष्ण से इस व्रत के बारे में पूछते है, तब कृष्ण बताते है, कि हजारों वर्ष की तपस्या से जो फल नहीं मिलता, वो फल इस व्रत के करने से प्राप्त हो जाता है ।।

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इससे अनजाने में किये मनुष्य के पाप भी क्षमा हो जाते है और उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है । भगवान कृष्ण बताते है, कि इस दिन दान का विशेष महत्व होता है । मनुष्य अगर अपनी इच्छा से अनाज, जूते-चप्पल, छाता, कपड़े, पशु, स्वर्ण आदि का दान करता है, तो इस व्रत का फल उसे पूर्णतः प्राप्त हो जाता है । उसे सांसारिक जीवन में सुख शांति, ऐश्वर्य, धन-दौलत, अच्छा परिवार मिलता है । भगवान कृष्ण ने बताया, कि इस व्रत को करने वाले मृत्यु के बाद नरक नहीं जाते और उन्हें यमराज का कभी नहीं होता है, बल्कि उसके लिये सीधे वैकुण्ठ का द्वार खुल जाता है ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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