पुत्रदा अथवा पवित्रा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।।

पुत्रदा अथवा पवित्रा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Putrada Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

पुत्रदा अथवा पवित्रा एकादशी के व्रत का माहात्म्य ।।

मित्रों, हमारे वैदिक सनातन धर्म में एकादशी का व्रत एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है । प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं । परन्तु जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या 24 से बढ़कर 26 हो जाती है ।।

वर्षभर के प्रत्येक मास में 2 एकादशीयां आती हैं । एक शुक्ल पक्ष और दूसरी कृष्ण पक्ष में । जो भक्त एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान से करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएं भगवान श्रीहरि विष्णु शीघ्र ही पूरी करते हैं ।।

भारतीय हिन्दू संस्कृति में हर महीने की 11वीं तिथि यानी एकादशी (ग्यारस) को व्रत-उपवास किया जाता है । यह तिथि अत्यंत पवित्र तिथि मानी गई है । वर्षभर की दो एकादशियों को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है ।।

एक श्रावण और दूसरी पौष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी, इन दोनों एकादशियों को पुत्रदा एकादशी कहते हैं । अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्तमान में पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी दिसंबर/जनवरी के महीने में पड़ती है । जबकि जुलाई/अगस्त के महीने श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी पड़ती है ।।

इसे पुत्रदा एकदशी, पवित्रोपना एकादशी, पवित्रा एकादशी के नाम से जाना जाता है । श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा है । उसकी कथा के सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । एक बार की बात है, कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, कि हे भगवन! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत को करने की विधि तथा इसका माहात्म्य भी कृपा करके बतायें ।।

भगवान मधुसूदन कहने लगे, कि हे राजन ! इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है । अब मैं आपको इसकी कथा बताता हूँ ध्यानपूर्वक सुनिए । क्योंकि इस कथा के सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल मिल जाता है ।।

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पुत्रदा अथवा पवित्रा एकादशी के व्रत के नियम ।।

इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को दशमी के दिन प्याज़-लहसुन से परहेज करना चाहिए । इस दिन किसी भी प्रकार का भोग-विलास भी नहीं करना चाहिए । दशमी की सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का पालन आरम्भ कर देना चाहिए ।।

इस दिन भगवान विष्णु के बाल रूप की पूजा होती है । द्वादशी के दिन भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर पूजा सम्पन्न करने के उपरान्त ब्राह्मण भोजन एवं दानादि के उपरान्त स्वयं पारण करना चाहिए ।।

पुत्रदा अथवा पवित्रा एकादशी के व्रत की कथा ।।

द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था । परन्तु पुत्रहीन होने के कारण राजा को अपना विशाल साम्राज्य भी सुखदायक नहीं लगता था । उसका मानना था, कि जिसके संतान न हो उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं ।।

पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को सन्तान की प्राप्ति नहीं हुई । वृद्धावस्था आता देख राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जित किया हुआ धन नहीं है । न ही मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है ।।

किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने कभी नहीं ली है । अपितु मैं अपनी प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा हूँ । मैं अपराधियों को भी अपने पुत्र तथा बाँधवों की तरह ही दंड देता रहा हूँ । कभी किसी से घृणा नहीं की, सबको समान माना है । साथ ही सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ ।।

इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मुझे कोई सन्तान नहीं है । सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है? राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए । वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए ।।

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राजा की इस उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे । एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेन्द्रिय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा ।।

जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था । सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया । उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा । मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए ही हुआ है, इसमें कोई संसय नहीं है ।।

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं । अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए । महिष्मति पुरी के धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करते हैं । फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी हैं ।।

उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं । अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं । आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है, कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं । अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ ।।

यह बात सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था । निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए थे । यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था ।।

एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया । उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी । राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा ।।

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इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा । एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है । ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है । अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो, आप ऐसा उपाय बताइए ।।

लोमश मुनि ने कहा कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा । साथ ही राजा को पुत्र की प्राप्ति भी अवश्य ही होगी ।।

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लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई । जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया । इसके पश्चात द्वादशी के दिन सबने अपने व्रत का पुण्य फल राजा को दे दिया ।।

हे राजन ! उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसको एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा । अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले को इस व्रत को अवश्य करना चाहिये ।।

इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है ।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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