वैदिक संस्कृति में मुख्य रूप से सोलह संस्कार माने गए है ।।

“संस्कार”

चरक ॠषि ने कहा है:- “संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते” ।।

अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद् गुणो का आधान करने को संस्कार कहते है ।।

 

बालक का जब जन्म होता है, तब वह दो प्रकार के संस्कार अपने साथ लाता है । एक प्रकार के संस्कार तो वे है, जिन्हें वह जन्म-जन्मान्तरों से अपने साथ लाता हैं, दूसरे प्रकार के संस्कार वे है, जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है ।।

 

वैदिक संस्कृति में मुख्य रूप से सोलह संस्कार माने गए है:-

1.गर्भाधान संस्कार ।।
2.पुंसवन संस्कार ।।
3.सीमान्तोन्नयन संस्कार ।।
4.जातकर्म संस्कार ।।
5.नामकरण संस्कार ।।
6.निष्क्रमण संस्कार ।।
7.अन्नप्राशन्न संस्कार ।।
8.चूड़ाकर्म संस्कार ।।
9.कर्णवेध संस्कार ।।
10.उपनयन संस्कार ।।
11.वेदारम्भ संस्कार ।।
12.समावर्त्तन संस्कार ।।
13.विवाह संस्कार ।।
14.वानप्रस्थ संस्कार ।।
15.संन्यास संस्कार ।।
16.अन्त्येष्टि संस्कार ।।

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हमें शास्त्रानुसार तपस्या और साधना करनी चाहिए दानादि श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करना चाहिए । उसके बाद सूत्र जो बचता है – उसका नाम – इंतजार है ।।

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नारायण सभी का कल्याण करें, सभी सुखी एवं सम्पन्न हों ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

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