अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।।

अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।। Shri Bharat Agraja Ashtakam हे जानकीश वरसायकचापधारिन् हे विश्वनाथ रघुनायक देव-देव। हे राजराज जनपालक

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राम राज्य का असली अभिप्राय समझें ।।

रघुवंश महाकाव्य के राजा दिलीप का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास कहते हैं कि – जिस प्रकार सूर्य, समुद्र से

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ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन – गोलोक खण्ड : अध्याय 2 – गर्ग संहिता ।।

ब्रह्मादि देवों द्वारा गोलोक धाम का दर्शन – गोलोक खण्ड : अध्याय 2 – गर्ग संहिता ।। devo dwara golok dham

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ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं!!

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। अर्थ:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्दों का अभाव

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।।Teacher is equal to God 4 विना गुरुभ्यो गुणनीरधिभ्यो, जानाति तत्त्वं न विचक्षणोऽपि ।

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God 2 निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः, स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते । गुणाति

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च । दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ।। अर्थ:- बहुत कहने से क्या ? करोडों

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् । यथा प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ।। अर्थ:- आत्मवान् लोगों का शासन गुरु करते हैं;

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

आचरणशील व्यक्ति की सहायता परमात्मा नित्य ।। पुरुषकारमनुवर्तते दैवम् ।। अर्थ:- दैव (परमात्मा) भी पौरुष (पुरुषार्थियों या चरित्रवानों)) का ही अनुसरण

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