दान के छः अंग ।। Six parts of donation.

दान के छः अंग ।।  Six parts of donation दाता प्रतिगृहीता च शुद्धिर्देयं च धर्मयुक् । देशकालौ च दानानामङ्गन्येतानि षड्

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सादा जीवन उच्च विचार ।। Sada Jivan Uchcha Vichar.

सादा जीवन उच्च विचार ।। Sada Jivan Uchcha Vichar. संसारे मानुष्यं सारं मानुष्ये च कौलीन्यम् । कौलिन्ये धर्मित्वं धर्मित्वे चापि सदयत्वम्

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सत्य से सबकुछ सम्भव है ।।

सत्य से सबकुछ सम्भव है ।। satya se sabkuchh sambhav hai. तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थलमरिर्मित्रं सुराः किंकराः, कान्तारं नगरं गिरिर्गृहमहिर्माल्यं मृगारिर्मृगः । पातालं

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मनुस्मृति का सच ।। Manusmriti Ka Sach

जय श्रीमन्नारायण, मित्रों, आजकल मैं बहुत देखता हूँ, कुछ लोग मनुस्मृति के विषय को लेकर काफी वाद-विवाद करते रहते हैं

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यु. पी. वाला ठुमका लगाऊं की हीरो जैसे नाच के दिखाऊं ।।

जय श्रीमन्नारायण, मित्रों, आज के समय में धर्म के प्रति लोगों की जो श्रद्धा है, वह एक विचित्र प्रकार की

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भगवान से विनती अथवा माँगना कहाँ तक उचित है ।।

भगवान से विनती अथवा माँगना कहाँ तक उचित है ।। bhagwan se mangana uchit ya anuchit भगवान से विनती – परमात्मा

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अथ श्रीदया शतकम् ॥ Shri daya shatakam

 अथ श्रीदया शतकम् ॥  Shri daya shatakam श्रीमान्वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥ श्रीः । प्रपद्ये तं

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अथ श्रीदेवताह्वान प्रकारः (गद्यम्) ।। Devatahvana prakarah

अथ श्रीदेवताह्वान प्रकारः (गद्यम्) ।।  Devatahvana prakarah  सर्वकर्मकारयितृभारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत- अनन्तगुणगणपरिपूर्ण-अनन्तावतारात्मक-अनन्तजीवान्तर्यामि बिम्बनामक परमात्मन्, मया प्रतिक्षणे मनोवाक्कायकर्मभिः क्रियमाणान् अनन्तापराधानगणय्य मदर्थमस्मद्गुर्वन्तर्गतभारतीरमणमुख्यप्राणेनानन्तवेदोक्तप्रकारेण क्रियमाणप्रार्थनोपरि दृष्टिं दत्वा

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अथ श्रीऋद्धि स्तवः ।। Shri Riddhi Stavah.

अथ श्रीऋद्धि स्तवः ।। Shri Riddhi Stavah श्रीमन्वृषभशैलेश वर्धतां विजयी भवान् । दिव्यं त्वदीयमैश्वर्यं निर्मर्यादं विजृम्भताम् ॥ १॥ देवीभूषायुधैर्नित्यैर्मुक्तैर्मोक्षैकलक्षणैः ।

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अथ श्रीउज्ज्वल वेङ्कटनाथ स्तोत्रम् ॥ Shri Ujjvala Venkatanatha stotram

अथ श्रीउज्ज्वल वेङ्कटनाथ स्तोत्रम् ॥ Shri Ujjvala Venkatanatha stotram रङ्गे तुङ्गे कवेराचलजकनकनद्यन्तरङ्गे भुजङ्गे शेषे शेषे विचिन्वन् जगदवननयं भात्यशेषेऽपि दोषे । निद्रामुद्रां

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