अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।।

अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।। Shri Bharat Agraja Ashtakam हे जानकीश वरसायकचापधारिन् हे विश्वनाथ रघुनायक देव-देव। हे राजराज जनपालक

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ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं!!

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। अर्थ:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्दों का अभाव

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God 2 निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः, स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते । गुणाति

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श्री कनकधारा स्तोत्रम् – अर्थ सहितम् ।।

एक बार भारत में बीहड़ आकाल पड़ने पर परमादरणीय आदिगुरू शंकराचार्य जी ने इस स्तोत्र का परायण करके सोने के

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श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् ।।

अथ श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ।। Shri Vishnu Sahasranam Stotram. अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रस्य भगवान् वेदव्यास ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीकृष्ण: परमात्मा देवता, अमृतां-शूद्भवो भानुरिति

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चतुर्विंशतिनाम प्रतिपादक चूर्णिका

चतुर्विंशतिनाम प्रतिपादक चूर्णिका ॥ ॥ श्री भद्राचल रामदास कृत चतुर्विंशतिनाम प्रतिपादक चूर्णिका ॥ श्रीमदखिलाण्ड कोटि ब्रह्माण्ड भाण्ड दाण्डोपदण्ड मण्डल सान्दोत्दीपित

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भरताग्रज श्रीराम अष्टकम् ।।

भरताग्रज श्रीराम अष्टकम् ।। हे जानकीश वरसायकचापधारिन् हे विश्वनाथ रघुनायक देव-देव। हे राजराज जनपालक धर्मपाल त्रयस्व नाथ भरताग्रज दीनबन्धो॥१॥ हे

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अथ श्रीरघुनाथ अष्टकम् ।।

अथ श्रीरघुनाथ अष्टकम् ।। शुनासीराधीशैरवनितलज्ञप्तीडितगुणं प्रकृत्याऽजं जातं तपनकुलचण्डांशुमपरम् । सिते वृद्धिं ताराधिपतिमिव यन्तं निजगृहे ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम् ॥

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अथ श्रीराघव अष्टकम् ।।

राघवं करुणाकरं मुनि-सेवितं सुर-वन्दितं जानकीवदनारविन्द-दिवाकरं गुणभाजनम् । वालिसूनु-हितैषिणं हनुमत्प्रियं कमलेक्षणं यातुधान-भयंकरं प्रणमामि राघवकुञ्जरम् ॥ १॥ मैथिलीकुच-भूषणामल-नीलमौक्तिकमीश्वरं रावणानुजपालनं रघुपुङ्गवं मम दैवतम्

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