अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।।

अथ श्री भरत अग्रज अष्टकम् ।। Shri Bharat Agraja Ashtakam हे जानकीश वरसायकचापधारिन् हे विश्वनाथ रघुनायक देव-देव। हे राजराज जनपालक

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ईश्वर ही एकमात्र सत्य है ।।

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ अर्थ:- समग्र ऐश्वर्य, शौर्य, यश, श्री, ज्ञान, और वैराग्य

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ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं!!

अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। अर्थ:- अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्दों का अभाव

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।।Teacher is equal to God 4 विना गुरुभ्यो गुणनीरधिभ्यो, जानाति तत्त्वं न विचक्षणोऽपि ।

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरु भगवान का रूप होता है ।। Teacher is equal to God 2 निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः, स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते । गुणाति

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च । दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ।। अर्थ:- बहुत कहने से क्या ? करोडों

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गुरु भगवान का रूप होता है ।।

गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् । यथा प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ।। अर्थ:- आत्मवान् लोगों का शासन गुरु करते हैं;

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भगवान से विनती अथवा माँगना कहाँ तक उचित है ।।

भगवान से विनती अथवा माँगना कहाँ तक उचित है ।। bhagwan se mangana uchit ya anuchit भगवान से विनती – परमात्मा

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अथ श्रीदया शतकम् ॥ Shri daya shatakam

 अथ श्रीदया शतकम् ॥  Shri daya shatakam श्रीमान्वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी । वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥ श्रीः । प्रपद्ये तं

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