गुरु भगवान का रूप होता है ।।

किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ।।

अर्थ:- बहुत कहने से क्या ? करोडों शास्त्रों से भी क्या ? चित्त की परम् शांति तो गुरु के बिना मिलना दुर्लभ ही है ।।

सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः ।
अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ।।

अर्थ:- अभिलाषा रखनेवाले, सब भोग भोगनेवाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु पद के योग्य नहीं होते ।।

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