वैदिक ज्ञान का अभिप्राय एवं मानव जीवन में वेदों की उपयोगिता ।।

वैदिक ज्ञान का अभिप्राय एवं मानव जीवन में वेदों की उपयोगिता ।। Vedic Gyan Ka Mahatva And Manav Jivan Me Vedon ki Upyogita

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारे वेद आज के किताबों की तरह नहीं हैं । न ही उनके विषय हमारे लौकिक पुस्तकों की तरह मनगढ़ंत हैं । वे कोई नैतिक धर्म संहिता भी नहीं हैं, जिसकी किसी एक ने या कुछ निश्चित लोगों ने मिल कर रचना की हो ।।

वे बाहरी और आंतरिक- दोनों तरह के खोजों की एक श्रृंखला हैं । प्राचीन काल में इन्हें ज्ञान की किताब (रेफरेंस बुक) के तौर पर देखा गया था ।।

वेदों में तमाम विषयों के बारे में बताया गया है, जैसे खाया कैसे खाया जाए, वाहन कैसे बनाए जाएं, अपने पड़ोसी से कैसा व्यवहार किया जाए और अपनी परम प्रकृति तक कैसे पहुंचा जाए । विदित है, कि वेद सिर्फ पढ़ने वाली किताबें नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अस्तित्व के तमाम पहलुओं की बुनियादी रूपरेखा हैं ।।

वेद मंत्रों का संबंध एक आकार को ध्वनि में बदलने से है

वेद मंत्रों का संबंध एक आकार को ध्वनि में बदलने से है । आज यह प्रमाणित तथ्य है, कि हर ध्वनि के साथ एक आकृति भी जुड़ी होती है । इसी तरह से हर आकृति के साथ एक खास ध्वनि जुड़ी होती है ।।

Vedon Ki Upyogita

आकृति और ध्वनि के बीच के इस संबंध को हम मंत्र के नाम से जानते हैं । आकृति को यंत्र कहा जाता है और ध्वनि को मंत्र । यंत्र और मंत्र को एक साथ प्रयोग करने की तकनीक को तंत्र कहते हैं ।।

उस काल में हमारे ऋषियों ने तमाम तरह के जीवों, उनकी ध्वनि और विभिन्न आकृतियों के बीच के इस संबंध को समझा और उसमें महारत हासिल की ।।

ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद का ज्यादातर हिस्सा इसी संबंध के बारे में है । ध्वनि में महारत हासिल करके आप आकृति के ऊपर भी महारत हासिल कर लेते हैं ।।

स्कूल- कॉलेज  का अध्ययन-

यही है मंत्रों का विज्ञान, जिसकी दुर्भाग्यवश गलत तरीके से विवेचना की गई है और उस का दुरुपयोग भी किया जाता है । ये व्यक्तिपरक विज्ञान हैं । स्कूल- कॉलेज में जाकर इनका अध्ययन नहीं किया जा सकता ।।

इसे समझने के लिए बहुत गहरे समर्पण और जुड़ाव की आवश्यकता है । इसी में डूबकर आपको जीना पड़ेगा, नहीं तो कोई प्राप्ति नहीं होगी । इसमें अगर आप कोई डिग्री हासिल करना चाहते हैं ।।

तो इससे आपको कुछ भी हासिल नहीं होगा । कुछ हासिल करने के लिए तो आपको इसके प्रति खुद को समर्पित करना होगा तभी कुछ हो सकता है ।।

आधुनिक शिक्षा विज्ञानी ऐसा मानते हैं कि शिक्षा -खेल, संगीत और कहानियों के माध्यम से दी जानी चाहिए । वैदिक काल में शिक्षा इसी तरह से दी जाती थी ।।

विज्ञान के महत्वपूर्ण पहलुओं को भी कहानी के रूप में समझाया जाता था । दुर्भाग्यवश बाद में आकर लोग इस प्रक्रिया को जारी नहीं रख पाए । उन्होंने विज्ञान को छोड़ दिया और कहानियों को आगे बढ़ाने लगे ।।

Vedon ki Upyogita

जाहिर है, जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कहानियां आगे जाएंगी तो उनमें कहीं न कहीं थोड़ा बहुत फेरबदल भी होगा । कई बार यह फेरबदल इतना ज्यादा हो सकता है कि कहानी एक अतिशयोक्ति का रूप ले ले, जैसा कि आज की धार्मिक कहानियों में सुनने को मिलता है ।।

वैदिक प्रणाली ने हमेशा मानवीय सोच को बेहतर बनाने और उसका स्तर उठाने पर जोर दिया है, सिर्फ ज्ञान बढ़ाने पर नहीं । लेकिन आज की पूरी शिक्षा व्यवस्था का जोर सूचनाएं देने पर है ।।

इंसान की सोच को विकसित करने पर नहीं । सही यह है कि हमें अपनी सोच को ही बेहतर और सुदृढ़ बनाना चाहिए । सच्ची आध्यात्मिक प्रक्रिया की शुरुआत तभी होती है, जब आपकी समझ का दायरा शारीरिक स्तर से उपर चला जाता है ।।

 

वैदिक विचारधारा और वेदमन्त्रों को जीवित रखने की प्रक्रिया

इसीलिए इस वैदिक विचारधारा और वेदमन्त्रों को जीवित रखने की प्रक्रिया को कर्मकाण्ड कहते हैं । क्योंकि चिंतन अलग मानसिकता की उपज होती है जो श्रेष्ठ साधन और साधना का मार्ग प्रशस्त करती है ।।

लेकिन उससे पहले आवश्यक है उस वस्तु का हमारे लिए होना । वेद मन्त्रों को नि:स्वार्थ भाव से जीवित रखना ये बहुत ही उच्च श्रेणी की योग्यता को दर्शाता या प्रमाणित करता है । लेकिन सभी ऐसे ही नहीं हो सकते ।।

इसलिए हमारे पूर्वजों ने इसकी उपयोगिता को मानव जीवन में दैनिक क्रियाकलापों से जोडकर इसे समाज के लिए आवश्यक बना दिया जिसे कर्मकाण्ड के रूप में प्रयुक्त किया गया और जो हमारी आवश्यकता बन गई ।।

हम भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के प्रयास में बालाजी वेद विद्यालय के माध्यम से लगे हैं । आप भी हमें सहयोग करें ताकि हमारी संस्कृति जो मानव जीवन का एकमात्र श्रोत है उसे जीवित रखा जा सके ।।

Swami Dhananjay Maharaj

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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